Source: 
जनसत्ता
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/46237-2013-06-05-04-22-33
Date: 
04.06.2013
City: 
New Delhi

जनसत्ता 5 जून, 2013: केंद्रीय सूचना आयोग का ताजा फैसला दूरगामी महत्त्व का है। इसने देश की राजनीति में पारदर्शिता की उम्मीद जगाई है। ऐसे समय जब घोटाले आए दिन की बात हो गए हों और सरकारी निर्णयों और नीति निर्धारण में पैसे वालों का दखल बढ़ता जा रहा हो, आयोग का फैसला ऐतिहासिक ही कहा जाएगा। आयोग ने कहा है कि राजनीतिक दल सूचनाधिकार कानून के दायरे में आते हैं। गौरतलब है कि आरटीआइ कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल और एसोसिएशन आॅफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स के अनिल बैरवाल ने कांग्रेस, भाजपा, राकांपा, माकपा, भाकपा और बसपा से उनके कोष और उन्हें चंदा देने वालों के बारे में जानकारी मांगी थी। मगर भाकपा को छोड़ कर दूसरी पार्टियां इसके लिए तैयार नहीं हुर्इं। उनकी दलील थी कि वे कोई सरकारी महकमा नहीं हैं, इसलिए उन पर सूचनाधिकार कानून लागू नहीं होता। उनके इनकार के बाद यह मामला केंद्रीय सूचना आयोग में गया। आयोग की पूर्ण पीठ ने संबंधित पार्टियों को मांगी गई जानकारी देने का निर्देश देते हुए यह व्यवस्था दी है कि राजनीतिक दल सूचनाधिकार कानून के तहत जवाबदेह हैं। इसलिए पार्टियों को डेढ़ महीने के भीतर सूचनाधिकारी की नियुक्ति करनी होगी। आवेदनों पर एक महीने में जवाब देना होगा। आरटीआइ प्रावधानों के तहत जरूरी सूचनाएं अपनी वेबसाइट पर डालनी होंगी। 
अपने इस फैसले के पीछे आयोग ने कुछ ठोस आधार दिए हैं। राजनीतिक दल का गठन निर्वाचन आयोग में पंजीकरण के जरिए होता है। उन्हें सरकार की ओर से कई सुविधाएं मिलती हैं, मसलन रियायती दर पर जमीन या बंगला, आयकर में छूट, चुनाव के समय दूरदर्शन और आकाशवाणी पर मुफ्त प्रसारण आदि। फिर, पार्टियां जनता का काम करने का दावा करती हैं। उन्हें आरटीआइ के तहत लाने के पक्ष में एक और ठोस तर्क है। सरकार का गठन उन्हीं के जरिए होता है। अगर पार्टियों के कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित न की जा सके तो सूचनाधिकार कानून का मकसद अधूरा रह जाता है। इसलिए आयोग के फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए। पर बहुत कुछ गोपनीय ढंग से करने के आदी राजनीतिक दल परेशानी महसूस करेंगे। अपने वित्तीय स्रोतों के बारे में खुलासा करना उनके लिए आसान नहीं होगा। यों अपने हिसाब-किताब और चुनावी खर्च का ब्योरा निर्वाचन आयोग को देना उनके लिए अनिवार्य है। पर यह खानापूरी होकर रह गया है। अव्वल तो पार्टियां अपने हिसाब-किताब पेश करने में आनाकानी करती रहती हैं। पर आयोग के बार-बार तगादे के बाद जब वे अपने आय-व्यय का ब्योरा देती भी हैं तो वह एक मोटा-सा हिसाब होता है, जिससे अमूमन बस यही पता चलता है कि किस साल में उन्हें कितना धन हासिल हुआ। मगर किसने कितना चंदा दिया, यह जानना संभव नहीं होता। 

चूंकि बीस हजार रुपए से कम चंदा देने वालों के नाम बताना जरूरी नहीं है, लिहाजा पार्टियां बड़ी-बड़ी रकम को छोटी-छोटी राशियों में बांट कर दर्ज करती हैं। क्या सूचना आयोग के ताजा फैसले से यह नियम अपने आप खारिज हो जाता है? फिलहाल यह साफ नहीं है। हो सकता है इस फैसले के बावजूद कानूनी लड़ाई आगे भी चले। जब निर्वाचन आयोग ने नामांकन के साथ उम्मीदवार की संपत्ति और उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला हो तो उसकी जानकारी देने का प्रावधान किया तो लगभग सभी पार्टियां इसके खिलाफ एकजुट हो गई थीं। आखिरकार सर्वोच्च अदालत के निर्देश से ही वह प्रावधान लागू हो पाया। हो सकता है सूचना आयोग के फैसले के खिलाफ विभिन्न पार्टियां उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाएं। पर अदालत ने भी उनका पक्ष नहीं लिया तो क्या वे सूचनाधिकार की आंच से बचने के लिए अपनी संसदीय शक्ति का सहारा लेंगी? वैसा हुआ तो उनके प्रति लोगों का भरोसा और कमजोर होगा। लिहाजा, उन्हें जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग का सामना करने के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।

 

 
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