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भाषा
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New Delhi

चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) के विश्लेषण के अनुसार, 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के पारित होने के बावजूद देश की चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अभी भी काफी कम है। राजनीतिक पार्टियां लोकसभा और विधानसभा चुनावों में हर 10 प्रत्याशी में केवल एक महिला उम्मीदवार को ही मैदान में उतार रही हैं।

‘‘चुनावों में महिला उम्मीदवार: महिला आरक्षण विधेयक, 2023 के बाद पार्टी टिकट बंटवारे का विश्लेषण’’ नाम की रिपोर्ट में, विधेयक के पारित होने के बाद से हुए लोकसभा और राज्य/केंद्र शासित प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ने वाले 51,708 उम्मीदवारों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि इनमें से केवल 5,095, यानी 10 प्रतिशत ही महिलाएं थीं।

रिपोर्ट में इस बारे में सवाल उठाया गया कि क्या संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण को लागू करने की पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति है। साथ ही, इस विधेयक के इतिहास का भी जिक्र किया गया, जिसे सबसे पहले 1996 में 81वें संविधान संशोधन विधेयक के तौर पर पेश किया गया था और बाद में 2008 में 108वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में लाया गया था।

इसमें, लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीट आरक्षित करने का प्रस्ताव किया गया।

सितंबर 2023 में, 128वां संविधान संशोधन विधेयक पारित किया गया, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है और जो आम तौर पर ‘महिला आरक्षण विधेयक’ के नाम से जाना जाता है।

हालांकि, आरक्षण के प्रावधान इसके कानून का रूप लेने के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर अगली परिसीमन प्रक्रिया के बाद ही लागू होंगे, और महिला आरक्षण को उसके बाद होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में लागू किया जाएगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2029 तक इस विधेयक को लागू करने के लिए 2026-27 की जनगणना का समय पर होना बहुत जरूरी है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में – जो संसद द्वारा महिला आरक्षण विधेयक को सर्वसम्मति से मंजूरी मिलने के कुछ महीनों बाद हुए थे – विश्लेषण किये गए 8,360 उम्मीदवारों में से केवल 800 महिलाएं थीं, जबकि 543 संसदीय क्षेत्रों में से 152 में एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं थी।

राष्ट्रीय पार्टियों में, भाजपा ने सबसे अधिक 16 प्रतिशत महिला उम्मीदवार उतारे, इसके बाद कांग्रेस और माकपा का स्थान आता है, जिन्होंने 13-13 प्रतिशत महिला उम्मीदवार उतारे, जबकि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 8 प्रतिशत महिला उम्मीदवार उतारे। रिपोर्ट के मुताबिक, आम आदमी पार्टी ने अपने 22 उम्मीदवारों में किसी भी महिला को टिकट नहीं दिया।

विधानसभा चुनावों में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला।

महिला आरक्षण विधेयक, 2023 के पारित होने के बाद, 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव हुए। ये चुनाव लड़ने वाले कुल 31,429 उम्मीदवारों में से, राजनीतिक दलों द्वारा उतारी गईं महिला उम्मीदवार केवल 3,273 (10.2 प्रतिशत) थीं।

विश्लेषण किये गए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चुनावों में, महिला उम्मीदवारों का अनुपात 14 प्रतिशत से अधिक नहीं रहा। पार्टियों द्वारा टिकट बांटने के मौजूदा तरीके के कारण महिलाओं की भागीदारी के लिए तय 33 प्रतिशत का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया।

वर्ष 2024 में ओडिशा विधानसभा में महिला उम्मीदवारों का अनुपात सबसे अधिक 13.9 प्रतिशत था, इसके बाद 2025 में दिल्ली में यह 13.7 प्रतिशत और 2026 में पुडुचेरी में 13.6 प्रतिशत रहा।

सभी राजनीतिक पार्टियों में, गैर-मान्यता प्राप्त दलों ने सबसे अधिक महिला उम्मीदवार उतारे — 13,413 उम्मीदवारों में से 1,502 महिलाएं थीं। इसके बाद, राष्ट्रीय पार्टियों का स्थान आता है, जिन्होंने 12,119 उम्मीदवारों में से 1,337 महिलाओं को मैदान में उतारा। निर्दलीय उम्मीदवारों की बात करें तो, 20,250 उम्मीदवारों में से 1,664 महिलाएं थीं।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘भारत दुनिया का सबसे बड़ा संसदीय लोकतंत्र है, जहां 66.29 करोड़ महिला मतदाता हैं। आईपीयू1 की रैंकिंग के अनुसार, एक मार्च 2025 तक संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत 185 देशों में 151वें स्थान पर है।’’

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 49 प्रतिशत है, जबकि मौजूदा संसद में महिलाओं की संख्या केवल 14 प्रतिशत है।


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