भारतीय राजनीति में पैसे का खेल हमेशा से ही दिलचस्प रहा है, लेकिन हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने सियासी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। जब बात चुनाव लड़ने और पार्टी चलाने की आती है, तो 'विटामिन-एम' यानी मनी (Money) सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती है। 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (ADR) की ताजा रिपोर्ट ने चंदे की दुनिया का ऐसा कच्चा चिट्ठा खोला है, जिसे देखकर बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित भी हैरान हैं। चुनावी ट्रस्टों के जरिए बरसे इस 'धनवर्षा' में एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) की तिजोरी लबालब भर गई है, वहीं दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की हालत देखकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर कैसे भाजपा ने चंदे के इस समंदर का 82 प्रतिशत हिस्सा अपने नाम कर लिया? आइए जानते हैं इस अरबों रुपये के खेल की पूरी कहानी। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 राजनीति के लिए बेहद 'कमाऊ' साल साबित हुआ है। देश के विभिन्न इलेक्टोरल ट्रस्टों को कंपनियों और रईसों से कुल 3,826.34 करोड़ रुपये का चंदा मिला। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरी राशि का 82.52 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारतीय जनता पार्टी की झोली में गया है। आंकड़ों में बात करें तो भाजपा को कुल 3,157.65 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि बाकी सारी पार्टियां इसके सामने बौनी नजर आती हैं। जानकारों का कहना है कि सत्ता में होने और मजबूत पकड़ के चलते कॉरपोरेट जगत का भरोसा भाजपा पर सबसे ज्यादा बना हुआ है, जिसका सीधा असर पार्टी के बैंक बैलेंस पर दिख रहा है। कांग्रेस और अन्य दलों का क्या है हाल? जहाँ भाजपा हजारों करोड़ में खेल रही है, वहीं कांग्रेस की स्थिति इस रिपोर्ट में काफी कमजोर दिखाई देती है। चंदे के कुल वितरण में कांग्रेस को महज 298.77 करोड़ रुपये मिले हैं, जो कुल राशि का सिर्फ 7.81 प्रतिशत है। यानी भाजपा और कांग्रेस के बीच चंदे का अंतर करीब 10 गुना से भी ज्यादा है। तीसरे नंबर पर ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) रही, जिसे 102 करोड़ रुपये मिले। बाकी अन्य 19 राजनीतिक दलों को मिलाकर केवल 267.91 करोड़ रुपये ही नसीब हुए। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि चुनावी फंडिंग के मामले में फिलहाल भाजपा का कोई मुकाबला नहीं है और विपक्ष वित्तीय संसाधनों के मोर्चे पर कड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। आखिर कौन हैं ये दानवीर? इस धनवर्षा के पीछे देश के बड़े कॉरपोरेट घरानों का हाथ है। रिपोर्ट के अनुसार, 228 कंपनियों ने मिलकर 3,636 करोड़ रुपये से अधिक का दान दिया है। सबसे बड़े दानदाता के रूप में 'इलेवेटेड एवेन्यू रिएल्टी एलएलपी' का नाम सामने आया है जिसने अकेले 500 करोड़ रुपये का योगदान दिया। इसके बाद टाटा ग्रुप की कंपनियों का दबदबा रहा। टाटा संस ने 308 करोड़ और टाटा कंसल्टेंसी (TCS) ने 217 करोड़ रुपये से अधिक का चंदा दिया। चौथे नंबर पर मेघा इंजीनियरिंग रही, जिसने 175 करोड़ रुपये दिए। इसके अलावा 99 अमीर व्यक्तियों ने भी अपनी जेब से करीब 187 करोड़ रुपये राजनीतिक शुद्धिकरण के नाम पर ट्रस्टों को सौंपे। चंदा बांटने वाली सबसे बड़ी मशीन राजनीतिक दलों को पैसा पहुंचाने के मामले में 'प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट' सबसे आगे रहा। इस अकेले ट्रस्ट ने 2,668 करोड़ रुपये से अधिक की राशि 15 अलग-अलग दलों को बांटी। इसके बाद 'प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट' का नंबर आया। हालांकि , एडीआर ने एक चिंताजनक पहलू यह भी उजागर किया है कि करीब 1,065 करोड़ रुपये देने वाले दानदाताओं के पते का खुलासा नहीं किया गया है। नियम के मुताबिक, ट्रस्ट को साल भर में मिले चंदे का 95 प्रतिशत हिस्सा राजनीतिक दलों को बांटना अनिवार्य होता है। इस पारदर्शी दिखने वाली प्रक्रिया के पीछे छिपे 'बेनाम' दानदाताओं ने अब एक नई बहस छेड़ दी है
