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Source
News4nation
Author
Hiresh Kumar
Date

Bihar ADR Report:बिहार की राजनीति में एक बार फिर सत्ता और सियासत के क्रिमिनल कनेक्शन को लेकर बड़ा बवाल खड़ा हो गया है।...

Bihar ADR Report:बिहार की सियासत में एक बार फिर सत्ता और संगीन का रिश्ता चर्चा में है। लोकतांत्रिक सुधार संघ और बिहार चुनाव निगरानी(Association for Democratic Reforms और Bihar Election Watch) की ताजा रिपोर्ट ने सम्राट सरकार की कैबिनेट पर ऐसे खुलासे किए हैं, जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी  की अगुवाई वाली सरकार के करीब आधे मंत्रियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, जबकि 90 फीसदी मंत्री करोड़ों की दौलत के मालिक हैं।

रिपोर्ट में सात मई को हुए मंत्रिमंडल फेरबदल के बाद 35 में से 31 मंत्रियों के चुनावी हलफनामों का पोस्टमार्टम किया गया। खुलासा ऐसा कि सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसर गया। आंकड़ों के मुताबिक 15 मंत्रियों यानी करीब 48 फीसदी ने खुद कबूला कि उनके खिलाफ क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें से 9 मंत्री ऐसे हैं जिन पर संगीन इल्जामात हैं। यानी कुर्सी के साथ-साथ मुकदमों का बोझ भी बराबरी से चल रहा है।

सियासी चौपालों में अब यह सवाल गूंज रहा है कि आखिर बिहार की सत्ता का रास्ता अदालतों और थानों से होकर क्यों गुजर रहा है? विपक्ष इसे “दागियों की दरबार” बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे राजनीतिक साजिश और विरोधियों की चाल कहकर बचाव में उतर आया है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कुछ नेताओं को हलफनामा देने की जरूरत ही नहीं पड़ी। जदयू केअशोक चौधरी और भाजपा के प्रमोद कुमार विधान परिषद के मनोनीत सदस्य होने की वजह से इस प्रक्रिया से बाहर रहे। वहीं आरएलएम के दीपक प्रकाश और जदयू के निशांत कुमार का ब्योरा भी शामिल नहीं हुआ क्योंकि वे फिलहाल किसी सदन के सदस्य नहीं हैं।

रिपोर्ट का दूसरा बड़ा धमाका मंत्रियों की दौलत को लेकर हुआ। 31 में से 28 मंत्री करोड़पति निकले। औसतन हर मंत्री के पास 6.32 करोड़ रुपये की संपत्ति बताई गई। भाजपा के रमा निषाद सबसे अमीर मंत्री साबित हुए, जिनकी घोषित संपत्ति 31.86 करोड़ रुपये है। वहीं लोजपा (रामविलास) के संजय कुमार ने सबसे कम 22.30 लाख रुपये की संपत्ति घोषित की।

शिक्षा  के मोर्चे पर भी दिलचस्प तस्वीर सामने आई। 71 फीसदी मंत्री ग्रेजुएट या उससे ऊपर की डिग्री वाले हैं, जबकि 8 मंत्री सिर्फ 10वीं से 12वीं तक पढ़े हैं। उम्र के लिहाज से सरकार में बुजुर्ग चेहरों का दबदबा कायम है। 81 फीसदी मंत्री 51 से 80 साल के बीच के हैं। वहीं महिलाओं की हिस्सेदारी बेहद कम दिखी। 35 मंत्रियों में सिर्फ 5 महिला मंत्री हैं, यानी महज 14 फीसदी प्रतिनिधित्व। अब बिहार की सियासत में सवाल यही है क्या जनता विकास का चेहरा देख रही है या फिर ‘दागी ताकत’ का नया चेहरा? सत्ता के गलियारों में यह रिपोर्ट किसी सियासी बारूद से कम नहीं मानी जा रही।


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