बिहार की धरती, जहां जयप्रकाश नारायण, डॉ. लोहिया और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं ने परिवारवाद के खिलाफ बिगुल फूंका, आज वहीं राजनीति में वंशवाद हावी होता दिख रहा है. जिन नेताओं ने विचारों को सर्वोपरि रखा, उन्होंने अपने परिजनों को राजनीति से दूर रखा। लेकिन आज, आंकड़े बताते हैं कि राज्य के 27% जनप्रतिनिधि परिवारवादी राजनीति से जुड़े हैं. क्या बिहार की विचारधारा बदल रही है? आइए, आंकड़ों की ज़ुबानी सच जानते हैं.
राजनीति में गहराता परिवारवाद: जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, परिवारवाद एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है. तमाम दल एक-दूसरे पर वंशवादी राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि हर दल में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जहां टिकट और सत्ता का रास्ता खून के रिश्तों से होकर गुजरता है. राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां इस मुद्दे पर अपने-अपने तर्क पेश कर रही हैं.
बिहार में परिवारवाद का बढ़ता प्रभाव: बिहार में राजनीति में परिवारवाद गहराता जा रहा है. एडीआर द्वारा 360 नेताओं के विश्लेषण में पाया गया कि कुल 27% यानी 96 सांसद, विधायक और विधान पार्षद परिवारवादी पृष्ठभूमि से हैं. यह आंकड़ा दर्शाता है कि बिहार की राजनीति में कई दलों के भीतर परिवारवाद मजबूत आधार रखता है. परिवारवाद की इस बढ़ती छवि ने राज्य की राजनीतिक प्रक्रियाओं और निर्णयों पर सवाल उठाए हैं, जो आगामी चुनावों में अहम भूमिका निभाएगा.
बिहार के क्षेत्रीय दलों में भी वंशवाद: बिहार के प्रमुख क्षेत्रीय दलों में भी परिवारवाद का असर साफ देखा जा सकता है. जनता दल यूनाइटेड (JDU) के 81 जनप्रतिनिधियों के विश्लेषण में पाया गया कि 25 विधायक, सांसद और विधान पार्षद वंशवादी पृष्ठभूमि से आते हैं, यानी कुल 31% नेता हैं. ठीक यही स्थिति राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की भी है, जहां 100 जनप्रतिनिधियों में से 31 परिवारवादी हैं कुल 31% हैं.

हम और एलजेपीआर भी कम नहीं: हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) जैसे छोटे दलों में यह अनुपात और भी अधिक है. हम पार्टी के 6 जनप्रतिनिधियों में से 3 वंशवादी हैं, यानी 50% हैं. वहीं, लोजपा (रामविलास) के 8 में से 4 नेता परिवारवादी पाए गए, जो कि कुल 50% है. ये आंकड़े बताते हैं कि बिहार के छोटे-बड़े सभी दलों में वंशवाद अब एक आम राजनीतिक चलन बन चुका है.
बिहार में पुरुष नेताओं में भी परिवारवाद: बिहार के 316 पुरुष सांसद, विधायक और विधान पार्षदों का विश्लेषण किया गया, जिसमें 71 नेता यानी करीब 22% परिवारवादी पृष्ठभूमि से जुड़े पाए गए. यह आंकड़ा दर्शाता है कि पुरुष जनप्रतिनिधियों में भी परिवारवाद की गहरी पैठ है. बिहार की राजनीति में परिवारवाद न सिर्फ सामान्य होता जा रहा है, बल्कि इसका असर पुरुष नेताओं के बीच भी साफ दिख रहा है, जो राज्य की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए चुनौती है.
महिला नेताओं में भी परिवारवाद: बिहार की राजनीति में भी परिवारवाद की छाप स्पष्ट दिखती है. 44 महिला जनप्रतिनिधियों के विश्लेषण में 25 यानी 57% महिलाएं वंशवादी परिवारों से आती हैं. यह आंकड़े बताते हैं कि महिला नेतृत्व में भी परिवारवाद की जड़ें गहरी हैं, जो राजनीतिक बदलाव की राह में चुनौती बन सकती हैं. राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में 41% महिला सांसद, विधायक और विधान पार्षद वंशवादी पृष्ठभूमि से हैं. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस मामले में सबसे आगे है, जहां 46% महिलाएं परिवारवादी हैं.
पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक वंशवादी: राष्ट्रीय स्तर पर कई पार्टियों में महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक वंशवादी पाई जा रही हैं. जनता दल यूनाइटेड में महिलाओं का 75% वंशवादी पृष्ठभूमि से है, पुरुषों में 23%. राष्ट्रीय जनता दल में 60% महिलाएं, भाजपा में 41%, और कांग्रेस में 46% महिलाएं परिवारवादी हैं, जबकि पुरुषों की तुलना में ये संख्या कम है. तेलुगु देशम पार्टी में 77% महिलाएं वंशवादी हैं, जबकि पुरुष केवल 30% हैं. समाजवादी पार्टी में 67% महिलाएं और 24% पुरुष वंशवादी हैं.
"कई राजनीतिक दल परिवारवाद से दूरी बनाए रखने का दावा जरूर करते हैं, लेकिन व्यवहार में वे इसे पूरी तरह लागू नहीं कर पाते. राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे केवल परिवार के सदस्यों को ही टिकट देने से बचें. इसके बजाय, कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जाए ताकि लोकतंत्र मजबूत हो सके और राजनीति में पारदर्शिता बढ़े. यह कदम राजनीति में परिवारवाद की जड़ें कमजोर करने में मदद करेगा." -राजीव कुमार, संयोजक, एडीआर
राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला: राष्ट्रीय स्तर पर विश्लेषण में सामने आया कि कुल 3214 नेताओं में से 657 यानी करीब 20% नेता परिवारवादी पृष्ठभूमि से हैं. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में यह संख्या 32% तक पहुंचती है, जबकि भारतीय जनता पार्टी में यह करीब 18% है. छोटे दलों में परिवारवाद लगभग नगण्य है, और सीपीएम में केवल 8% नेता ही परिवारवादी हैं. यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि परिवारवाद हर पार्टी में अलग-अलग रूप में मौजूद है.
राज्यों में भी परिवारवाद की पैठ: परिवारवाद या वंशवाद सिर्फ राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि कई राज्यों में भी यह गहराई से फैला हुआ है. कुल 1809 विश्लेषित उम्मीदवारों में से 406 यानी लगभग 22% सांसद, विधायक और विधान पार्षद परिवारवादी पृष्ठभूमि से आते हैं. उदाहरण के तौर पर, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस में 42% नेता परिवारवादी हैं.
22% नेता है वंशवादी: वहीं वाईएसआर कांग्रेस में 38%, टीडीपी में 36%, और एनसीपी में 34% नेता वंशवादी पृष्ठभूमि से हैं. इसके अलावा समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, असम गण परिषद और राष्ट्रीय जनता दल जैसे दलों में भी लगभग 30% या उससे अधिक निर्वाचित प्रतिनिधि राजनीतिक परिवार से जुड़े हैं. यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि परिवारवाद राज्य स्तर की राजनीति में भी गहरा प्रभाव डाल रहा है.
"बिहार की राजनीति के लिए अभिशाप है और सभी राजनीतिक दलों को इससे दूर रहना चाहिए. विपक्षी पार्टियों को परिवारवाद पर अपना स्पष्ट स्टैंड लेना होगा. जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसने परिवारवाद के खिलाफ कुर्बानी दी है. वे मानते हैं कि 2025 के विधानसभा चुनाव में ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो परिवारवादी नहीं हैं, ताकि बिहार की राजनीति में सकारात्मक बदलाव आ सके."
