बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में जहां अमीरी की चमक-दमक दिख रही है, वहीं उम्मीदवारों की क्राइम कुंडली भी चौंकाने वाली है. ADR की रिपोर्ट के अनुसार, इस चरण में बड़ी संख्या में उम्मीदवार ऐसे हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं. यह स्थिति बताती है कि राजनीति में अपराध और शक्ति का गठजोड़ अब भी कायम है.
मुख्य दलों में अपराध का ग्राफ : जेडीयू के 44 उम्मीदवारों में से 14 पर आपराधिक केस दर्ज हैं, यानी 32 प्रतिशत. बीजेपी के 53 में से 30 उम्मीदवार दागी, यानी 57 प्रतिशत, जिनमें 22 गंभीर केस वाले हैं. आरजेडी के 70 में से 38 उम्मीदवारों पर केस, यानी 54 प्रतिशत, जबकि 27 गंभीर केस में फंसे हैं. कांग्रेस के 37 में से 25 उम्मीदवारों पर केस, यानी 68 प्रतिशत, जिनमें से 20 गंभीर अपराधों में शामिल हैं.
छोटे दलों की स्थिति भी कम नहीं : जन सुराज पार्टी यानी JSP के 117 उम्मीदवारों में से 58 पर केस है, यानी 50 प्रतिशत, जबकि 51 गंभीर मामलों में फंसे हैं. VIP पार्टी के 7 में से 5 उम्मीदवार दागी, यानी 71 प्रतिशत उम्मीदवारों की छवि पर दाग है. वहीं, CPI(ML) के 6 में से 5 उम्मीदवारों पर केस है, यानी 83 प्रतिशत. एलजेपी (R) के 15 में से 9 दागी, यानी 60 प्रतिशत प्रत्याशियों की छवि दागी है.
टॉप 3 क्राइम केस वाले कैंडिडेट : बिहार में टॉप टेन प्रत्याशियों की बात करें तो सबसे ज्यादा केस जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी मनीष कश्यप (चनपटिया) पर है. उनपर कुल 56 सीरियस IPC की धारा दर्ज है जिनपर 22 केस दर्ज हैं. वहीं निर्दलीय प्रत्याशी संजीत कुमार बादल गुप्ता (हरलाखी) पर 45 गंभीर मामले हैं जिनपर 14 केस दर्ज हैं. RJD के देवा गुप्ता (मोतिहारी) पर 40 गंभीर अपराध हैं जिनमें से 28 पर केस किया गया है.
राजनीति में दाग अच्छे हैं? : एडीआर रिपोर्ट का इशारा है कि बिहार में अपराध और राजनीति का यह गठजोड़ नया नहीं है. कई उम्मीदवारों के खिलाफ हत्या, अपहरण, लूट, धमकी और हिंसा जैसे गंभीर आरोप हैं. जो जितना बाहुबली होगा उसके जीत की संभावना उतनी ही अधिक होगी!
सत्ता में प्रभाव की राजनीति : चुनावी विश्लेषक इसे 'सत्ता में प्रभाव की राजनीति' बताते हैं, जहां अपराधी छवि भी वोट बैंक में तब्दील हो जाती है. दूसरी ओर, मतदाताओं का यह तर्क भी सामने आता है कि ऐसे उम्मीदवार 'काम कराने वाले' माने जाते हैं.
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी : ADR की यह रिपोर्ट लोकतंत्र के लिए चेतावनी की तरह है. जब आधे से ज्यादा उम्मीदवारों पर आपराधिक केस दर्ज हों, तो यह चुनाव की पवित्रता पर सवाल खड़ा करता है. कानून विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक दलों को टिकट वितरण में पारदर्शिता लानी होगी और मतदाताओं को भी सजग होकर फैसला लेना होगा.
