19 सितंबर 2023 में जब देश की संसद से महिला आरक्षण बिल पास हुआ, तो इसे भारतीय राजनीति में आधी आबादी के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ माना गया था. दावा था कि अब राजनीति में महिलाओं का दबदबा बढ़ेगा. लेकिन क्या वाकई इस कानून के बाद हमारे राजनीतिक दलों की सोच में कोई बदलाव आया है? इसी बड़े सवाल का जवाब देने के लिए चुनावी सुधारों पर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने अपनी एक बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है.
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2023 में पास हुए महिला आरक्षण बिल से अभी तक भारतीय राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी को कोई बड़ा फायदा नहीं मिला है. इस बहुचर्चित बिल में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित करने का वादा किया गया था.
राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी बेहद कम
महिला आरक्षण बिल पास होने के बाद हुए 2024 के लोकसभा चुनाव और 20 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का जब एडीआर (ADR) ने विश्लेषण किया, तो सामने आया कि कुल 39,789 उम्मीदवारों में से केवल 4,073 (यानी 10.2%) ही महिलाएं थीं.
2024 के लोकसभा चुनावों की बात करें तो कुल 8,360 उम्मीदवारों में से केवल 800 (9.6%) महिलाएं थीं. इतना ही नहीं, देश की 152 लोकसभा सीटें (28%) ऐसी थीं, जहां से एक भी महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में नहीं थी.
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में भी हालात कुछ खास बेहतर नहीं रहे. वहां कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या सिर्फ 10.2% थीं. किसी भी राज्य में महिला उम्मीदवारों का आंकड़ा 14% पार नहीं कर सका, जो कि इस बिल द्वारा तय किए गए 33% के लक्ष्य से बहुत पीछे है.
महिलाओं की भागीदारी के मामले में ओडिशा (13.9%), दिल्ली (13.7%) और पुडुचेरी (13.6%) जैसे राज्य सबसे आगे रहे. जबकि, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर इस रेस में सबसे पीछे रहे, जहां महिला उम्मीदवारों की संख्या केवल 4.9% थी.
प्रमुख राजनीतिक दल लक्ष्य से पीछे छूटे
कोई भी बड़ा राष्ट्रीय दल महिला उम्मीदवारों के लिए तय किए गए 33% के लक्ष्य को पूरा नहीं कर सका. लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने केवल 16% और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने महज 13% महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया.
हालांकि, कुछ क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन बेहतर रहा. जैसे नाम तमिलर काची ने 50% महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा और बीजू जनता दल (BJD) 33% के लक्ष्य तक पहुंचने में सफल रहा. लेकिन, ये पार्टियां केवल अपवाद थीं, आम चलन ऐसा नहीं था.
2024 के आम चुनाव में 279 महिला उम्मीदवारों ने निर्दलीय चुनाव लड़ा, इनमें से एक भी नहीं जीत सकी.
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि सिर्फ कानूनी कोटा तय कर देना ही काफी नहीं है. इसके लिए एडीआर (ADR) ने कुछ जरूरी सुझाव दिए हैं:
- सभी पार्टियों के लिए कम से कम एक-तिहाई (33%) टिकट महिलाओं को देना अनिवार्य किया जाए.
- महिला उम्मीदवारों को उनकी योग्यता के आधार पर चुना जाए, न कि उनके पुरुष रिश्तेदारों के विकल्प (प्रॉक्सी) के रूप में.
- महिला उम्मीदवारों को ट्रेनिंग, मेंटरशिप (मार्गदर्शन) और आर्थिक मदद दी जाए.
- राजनीतिक पार्टियों और समाज के अंदर महिलाओं के प्रति सोच बदलने (जेंडर सेंसिटाइजेशन) के प्रयास किए जाएं.
- जो पार्टियां ज्यादा महिला उम्मीदवार उतारती हैं, उन्हें बढ़ावा देने के लिए सरकारी फंड की मदद (पब्लिक फंडिंग इंसेंटिव्स) दी जाए.
लोकसभा 2024 और राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा चुनाव में महिला उम्मीदवार (महिला आरक्षण बिल, 2023 के बाद)
- महिला आरक्षण बिल, 2023 के पास होने के बाद, साल 2024 के लोकसभा चुनाव आयोजित किए गए थे. विश्लेषण किए गए कुल 8,360 उम्मीदवारों में से केवल 800 (9.6%) महिलाएं थीं. कुल 543 लोकसभा क्षेत्रों (सीटों) में से 152 (28%) निर्वाचन क्षेत्र ऐसे थे, जहां एक भी महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में नहीं थी.
- महिला आरक्षण बिल, 2023 के पास होने के बाद, देश के 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव आयोजित किए गए. इन चुनावों में किस्मत आजमाने वाले कुल 31,429 उम्मीदवारों में से राजनीतिक दलों द्वारा केवल 3,273 (10.2%) महिलाएं ही चुनाव मैदान में उतारी गईं.
- विश्लेषण किए गए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में, महिला उम्मीदवारों का आंकड़ा किसी भी राज्य में 14% से ऊपर नहीं जा सका. राजनीतिक दलों द्वारा टिकट बांटने के मौजूदा तरीके को देखते हुए, महिलाओं की 33% हिस्सेदारी का लक्ष्य अभी भी अधूरा है.
- ओडिशा (2024) में महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत सबसे अधिक 13.9% रहा. इसके बाद दिल्ली (2025) में 13.7% और पुडुचेरी (2026) में यह आंकड़ा 13.6% रहा.
राजनीतिक दलों द्वारा महिला उम्मीदवारों को टिकट वितरण का विश्लेषण किया गया.यह आंकड़े हाल के लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों में प्रमुख राष्ट्रीय दलों और राज्य (क्षेत्रीय) दलों द्वारा उम्मीदवारों के नामांकन में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का एक स्पष्ट और विश्लेषणात्मक विवरण (ब्रेकडाउन) प्रदान करते हैं.
लोकसभा चुनाव 2024: (मुख्य फोकस: 20 से अधिक उम्मीदवारों वाली पार्टियां)
- 2024 के लोकसभा चुनावों में कोई भी राष्ट्रीय पार्टी महिला उम्मीदवारों के लिए तय एक-तिहाई (33%) के लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकी.
- जहां बीजेपी (BJP) और कांग्रेस (INC) ने केवल 13% से 16% के बीच महिला उम्मीदवार उतारे, वहीं कई क्षेत्रीय दलों में महिलाओं की भागीदारी काफी ज्यादा रही. इनमें नाम तमिलर काची (50%), बीजू जनता दल (33%), राष्ट्रीय जनता दल (29%) और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (25%) शामिल हैं.
- 2024 के लोकसभा चुनावों में केवल दो क्षेत्रीय दल ही ऐसे थे जिन्होंने अपने कुल उम्मीदवारों में से 33% या उससे अधिक महिलाओं को टिकट दिया. ये दल नाम तमिलर काची (50%) और बीजू जनता दल (33%) थे.
राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा चुनाव
यह विश्लेषण महिला आरक्षण बिल, 2023 के पास होने के बाद हुए 20 विधानसभा चुनावों पर आधारित है. राष्ट्रीय पार्टियों में से, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने केवल सिक्किम विधानसभा चुनाव में ही 33% महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया.
- क्षेत्रीय (राज्य) पार्टियों की बात करें तो, नाम तमिलर काची ने पुडुचेरी और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में भाग लिया और दोनों ही चुनावों में 50% महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा.
- इसके अलावा, भाकपा (माले) (लिबरेशन) ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 56% और असम विधानसभा चुनाव में 33% महिला उम्मीदवार उतारे.
- समाजवादी पार्टी ने राजस्थान विधानसभा चुनाव में 40% महिलाओं को टिकट दिया.
- विदुथलाई चिरूथैगल काची ने पुडुचेरी विधानसभा चुनाव में 50% महिला उम्मीदवारों को उतारा
- राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपने 50% टिकट महिला उम्मीदवारों को दिए.
यह रिपोर्ट राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के रास्ते में आने वाली गहरी रुकावटों को भी सामने लाती है. इनमें पुरुषों के वर्चस्व वाली पार्टियां, पार्टी के अंदर लोकतंत्र की कमी, पैसों की तंगी और समाज में महिलाओं को लेकर बनी पुरानी सोच शामिल हैं. राजनीतिक परिवारों या अमीर बैकग्राउंड से आने वाली महिलाओं को टिकट मिलने की संभावना ज़्यादा होती है, जबकि ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली महिलाओं को बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
